धनवन्तरी कवच प्रयोग विधि
धनवन्तरी कवच सर्वप्रथम घर ले जाकर प्रथम बार प्रयोग करने से पहले धनवन्तरी कवच को एक बार पहले दूध से फिर जल से शुद्ध करके सुखाकर सूखे कपड़े में लपेट कर रखें तथा संकल्प लें कि भगवान मंत्र सिद्धि के समय दी गयी आहुति में आपका योगदान समाहित करके स्वीकार करें।
1- जब भी आपको दाल या रेशेंदार सब्जी बनानी है तो धनवन्तरी कवच को धेकर नींबू का लेप करके 10 मिनट के लिए रख दें तथा छोंकने के बाद दाल, सब्जी पानी इत्यादि डालने के बाद धनवन्तरी कवच को दाल, सब्जी में छोड़ दें तथा कूकर या भगोना ढक दें। सब्जी या दाल पकने पर धनवन्तरी कवच को निकालकर धोकर सुखाकर साफ सूखे कपड़े में लपेट कर रख दें।
2- धनवन्तरी लौह कवच को भी धनवन्तरी कवच की भाँति प्रयोग करना है।
3- सूखी सब्जियों में लौह कवच को इसी प्रकार बनाने में 10 मिनट पहले नींबू का लेप करके रखना है तथा फिर लौह कवच को पानी से धोना है। धोऐ हुए जल को ही सब्जी में डालना है, ध्यान रहे उतने ही जल से लौह कवच को धोऐं जितना जल आपको अपनी सब्जी के लिये आवश्यक है।
4- विशेष – ध्यान रहे, दोनों कवचों को (धनवन्तरी कवच एवं लौह कवच) एक साथ सब्जी या दाल में कभी भी प्रयोग नहीं करना है। ना ही एक ही कपड़े में लपेटकर रखना है। अति सुंदर फल प्राप्त करने के लिए प्रतिदिन दोनों कवच का प्रयोग दिन में एक-एक बार अवश्य करें। लोहे की कढ़ाही में पीले कवच का प्रयोग नहीं करना है। लौह कवच का प्रयोग कर सकते हैं। कढी में पीले धनवन्तरी कवच का प्रयोग नहीं करेंगे। लेकिन लौह कवच का प्रयोग कर सकते हैं।
यदि लौह कवच का प्रयोग करने से दाल, सब्जी या कढ़ी का रंग कुछ गहरा या साँवला हो जाता है तो डरे नहीं। कवच को छोंकने के बाद पानी डालने के बाद ही सब्जी या दाल में डालना हैं।
वैज्ञानिक एवं आयुर्वेदिक रुप से सत्यापित निम्न धातुओं की रोग निरोधक क्षमताएँ
1- ताँबा :- कैंसर, लीवर
2- जस्ता :- कैंसर, मधुमेह, प्रोस्टेट
3- लोहा :- एनीमिया
4- कैल्शियम :- मिट्टी की हॉण्डी में पकने वाले दूध, जमने वाली छाछ या दही में कैल्शियम की मात्रा सुपाच्य होकर लगभग दोगुनी हो जाती है जो महिलाओं में हड्डियों की कमजोरी एवं पुरुषो में नपुंसकता को रोकने के लिए अति आवश्यक है।
यद्यपि शिक्षित वर्ग इंटरनेट से प्रभावित होकर ताँबे के बर्तन एवं कुछ लोहे के बर्तनों का उपयोग करने लगा है परन्तु यह नगण्य रूप से ही प्रभावी है।