परिचय – भगवान धनवन्तरी जी

भगवान धनवन्तरी, भगवान विष्णु के अवतार माने जाते हैं।
धनवन्तरी भगवान समुद्र मंथन से उत्पन्न हुए, तब उन्होंने विष्णु जी से अन्य देवताओं की भाँति हवन में अपना स्थान माँगा। तब विष्णु ने कहा कि सभी स्थान तो आवंटित हो चुके हैं अतः जब आप द्वापर युग में अवतार लोगे तो पृथ्वी पर अपने ज्ञान से दुःख निवारक के रूप में देवत्व प्राप्त करोगे। घी तथा दूध की आहूति आपको प्राप्त होगी। द्वापर युग में काशी नरेश दीर्घतापस के पुत्र धन्व के पुत्र के रूप में धन्वन्तरी ने जन्म लिया तथा ऋषि भारद्वाज से आयुर्वेद की शिक्षा ग्रहण करके देवत्व प्राप्त किया। धनवन्तरी जयन्ती ‘धनतेरस’ के दिन मनाई जाती है। धनवन्तरी जी की प्रिय धातु पीतल है।

भगवान धनवन्तरी वंशावली

विष्णु पुराण अध्याय-8 के अनुसार ‘पुरुरवा- पुत्र-आयुष- पुत्र –
क्षतवध – पुत्र – सुहौत्र – पुत्र दीर्घतापस – पुत्र – धनवन्तरी – पुत्र –
केतुमत – पुत्र – भीमरथ – पुत्र – दिवोदास – पुत्र-प्रतर्दन – पुत्र-वत्स –
पुत्र-अलर्क ने 60600 वर्षों तक राज किया। प्रतर्दन के पुत्र वत्स को ब्राह्मण
एवं पुत्र गर्ग को क्षत्रिय जाति का संस्थापक माना जाता है।

परिचय-ऋषि वत्स

आयुर्वेद रत्न विनोद वत्स ने प्रपितामह श्री रामदत्त वैद्य, पितामह श्री सोमदत्त वैद्य, पिताश्री शिव शर्मा वत्स वैद्य जी, की वंश परम्परा को आगे बढ़ाते हुए बी०एस०सी० बॉयोलॉजी के उपरान्त आयुर्वेद की उपाधि प्राप्त की और आध्यात्मिक रुचि के कारण एम०ए० दर्शन शास्त्र एवं महेश योगी ध्यान केन्द्र से मेडिटेशन की शिक्षा प्राप्त की और समाज में व्याप्त सुख-दुःख का चितंन करते रहे हैं। अध्ययन में रुचि एवं जिज्ञासु प्रवृत्ति के कारण डिप्लोमा यूनानी
मैडिसिन, एल०एल०बी०, रूसी भाषा का अध्ययन भी किया है।
विनोद वत्स चालीस वर्षो से आयुर्वेदिक चिकित्सक के रुप में और एम०एन० पब्लिक स्कूल के प्रबन्धक के रुप में समाज के हर वर्ग के बालकों की शिक्षा, स्वास्थ्य पारिवारिक पृष्ठभूमि का अवलोकन करते हुए यहाँ तक पहुँचे हैं और अब स्वेच्छा से मानव कल्याण के लिए ऋषि भाव को स्वीकार कर लिया है।